यह शहर
मरता नही है ।
अतीत के बोझ से दबा
अपने वर्तमान में
यह सिर्फ फूल रहा है
फल नही पाता।
वक़्त के थपेडों
से जर्जर
इसकी धमनियाँ
सह नहीं पाती सैलाब
जो दिन प्रतिदिन
बढ़ता ही लगता है
पर वो फटती भी नहीं।
इसकी झुर्रिदार छाती के
बेतरतीब गोदने
इसकी नग्नता को
कुछ ज्यादा ही वीभत्स बना देते हैं
पर ये नित नए डिजाईन बनाता है खुद पर।
इसका फूला पेट
काश
इसकी सम्पन्नता का द्योतक होता
इसमें तो गैस की बीमारी है
शायद इसीसे
इसका हाजमा दुरुस्त नही रहता
- दस्त और उल्टियां
हर वक़्त घिनाये रहता है
इसके वमन को
स्वच्छ हवा मिलती है
एक आदरणीय विसर्जन कहाँ यहाँ ।
गठिया-ग्रस्त इसके घुटने
लगता है अब जवाब देंगे
लेकिन
लगे रहते हैं
घसीटते हुए छिले तलवे
जमीं पे इसे
एक अच्छी पकड़ भी नहीं देते
अपनी बेजान बांहों
को आड़े तिरछे
फैलाता हुआ
यह किसी तरह
जमा हुआ है।
दिल और दिमाग
दोनो में
फफूंद सा लग गया है इसके
बेचैन यह
हमेशा तड़पता रहता है
पर मरता नही है।
कुछ नहीं ऐसा
जो इसके जीवन को
एक मतलब देता
लेकिन यह नही समझता
अपने प्रहरियों के प्रहार सहता है
और जीता रहता है
मरता नही है।
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2 comments:
itni achchhi kavita likhne k bad bhi chodne ki sochi kaise aapne.....likhte rahiye.
वाकयी सर, ये बहुत ही गहरी है
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