Sunday, January 13, 2008

एक लाख की कार

जमशेदजी के प्रपौत्र के पाँव
जमीन पर नही पड़ रहे
बधाईयों का तांता लगा है
देश-विदेश में खबर बनीहै
लखटकिया एक सपना सजा है
बरखुरदार बडे संतुष्ट लगते हैं
रिटायरमेन्ट की बात करते हैं
लोग-बाग़ भी बहुत खुश हैं
दो चक्कों पर सपरिवार
अपनी ज़िंदगी खीचने वाले
आशा का मधुर रस पी रहे हैं
वाह! क्या सपना सजा है ...
बडे लोगों की बड़ी-बड़ी बातें
तंग बेडौल रास्तों पे चलनेवाले
छोटे शहरों की बड़ी आबादी
कब से अपने सपने सजाने लगी
हमारे सपनों के सपने तो
रतन सरीखे रत्नों के ही हैं
नमन स्वपन-शिरोमणि
हम तमाम जामों में बैठ कर
आपके सपने का मजा लेते नही थकेंगे।

Friday, January 4, 2008

एक दर्द

दर्द की बात करें तो
दर्द में भी एक बात है
दर्द ना हो तो
हमदर्दी भी नही रहेगी
मानवता के अनेकों
अलग-थलग पड़े ब्रह्मांडों
के बीच का पुल भी
मिट जायेगा
दर्द के जाने का सुकून भी
नहीं रहेगा
फिर क्या मज़ा आएगा ?
दर्द का अस्तित्व
इसकी सत्ता को
आधार देता है -
दर्द है इसीलिए
यह सर्वोपरि है .
कहा जाए तो
दर्द ही अस्तित्व का
आधार है .

एक छोटा सा टुकडा
एक पतली सी नली से
निकलने की
कोशिश करता है
अब अगर दर्द ना हो
तब कैसी नली
और कैसा टुकडा
कौन यह जानना चाहेगा
कि दूध में भी
विष है
कि पालक से भी
खतरा है
कि मूत्र-विसर्जन
की भी अपनी एक
कला हो सकती है
की बचपन से सुनी
बडों की वह बात
कि दर्द के रिश्ते
बडे गहरे होते हैं
में वाकई सच है
एक दर्द ने फिर
यह अहसास दिलाया .
दर्दोपरांत मिली सहानुभूतियाँ
दर्द की एकसमग्रता नहीं तो क्या हैं ?

Tuesday, January 1, 2008

एक साल

क्या खूब गया
जो बीत गया
क्या साल रहा
एक जीवन में
एक दिशा मिली
एक दशा गया
नए सपनों का
निर्माण हुआ
कुछ जाने दुर्गम
पंथों पर
पैदल चलना
आसान हुआ ।
घरवाले डरे
शुभचिंतक बिगड़े
पर दिल अपनी ही
राह चला
निर्वासित जीवन
से उबकर
अपनों के
संग को
वो मचला।
दिल एक
नहीं था
ऐसे में
मन का भी
ऐसा ही
हाल हुआ
एक असफल विपस्सना
के पश्चात्
ज्ञान का यूँ
संचार हुआ
सब ढेर हुए
उसके अड़चन
नयी जागृति का
अहसास हुआ
जीवन की
गहमा-गहमी में
कर्तव्य-बोध का
भाष हुआ -
एक सुदूर गाँव की
गलियों और
घर में रौशन
चिराग हुआ
आजादी के
छः दशकों बाद
'तमकुहा' तम से
आजाद हुआ ।
क्या
खूब गया
जो बीत गया ...



* तमकुहा एक गाँव है जिसके निवासियों को अगस्त १५, २००७ को पहली बार बिजली नसीब हुई

Sunday, December 30, 2007

एक नेत्री की शहादत

पडोसी देश में
माहौल गरम है
एक बहुत बड़ा खून हुआ है
एक बड़ी नेत्री
शहीद हो गयी हैं
खानदानी आदत सी थी।
उनकी शहादत ने
हिला दिया है
सबको
महासागरों के
उस पार से
इस पार तक ।
अटकलों का बाज़ार
ज़बरदस्त गरम है
आदतानुसार ।
आतंकवादियों से लेकर
सत्ता के ठेकेदारों तक
सब पर उंगलियाँ
उठ रही हैं
काले बाज़ारों में
सट्टे लग रहे हैं -
मौत गोली से हुयी या
सदमे से
गोली लगी तो
चलायी किसने
आदि सवाल
जैसा कि
ऐसी शहादतों में
अक्सर होता है ।
जनता पागल हो गयी है -
आगजनी और तोड़फोड़
भी होता ही है ऐसे मे
जोश में होश खोना
तो बखूबी आता है आवाम को
पुरानी आदत है भीड़ की ।
भूलने की भी तो
पुरानी आदत ही है
और भला
'पुरानी आदतें ऐसे ही
थोडे जाती हैं । '
मुहावरों का भी कुछ
औचित्य तो रहता ही है
जैसे,
'जब बोया पेड़ बबूल का
आम कहाँ से खाए'
या फिर,
'मियाँ की जूती
मियाँ के सर पर'।
सांप तो
बरसों पीये दूध का कमाल
दिखायेगा ही।

Thursday, December 27, 2007

एक और रिक्शावाला

एक रिक्शेवाले ने
आज रुला दिया...
शर्म से
पानी-पानी हो गया मैं।
एक हट्टे-कट्टे
रंगरूट को
एक असहाय वृद्ध के
महीनों पहले टूटी टांग से
आधे पैडल पर
धीरे-धीरे खींचते देख
भला किसका दिल
द्रवित नही होगा।
पता नहीं कितने
रंगरूटों ने
उसे देख
उसपर अफ़सोस किया होगा
आधे पैडल की
वो धीमी गति
पता नही कितने दिलों के
तह में पहुँची होगी
पता नही कितनों ने
उसे पाँच ज्यादा दिया होगा।
पर उसकी मजबूरी कि
वह अभी भी
खींच रहा था
अपनी टूटी टांग से
आधे पैडल पर
दिलदारों को।
मैं इतना खुश हूँ कि
मेरे आँसू निकले
वह अब नही खींचेगा
किसी अन्य के बोझे को।

Thursday, December 20, 2007

एक किसान

किसानों के परिवेश
से पनपे होने
पर भी
मैंने परसों तक
एक बहुत अच्छे किसान को
कभी नहीं देखा था।
परसों जो दिखें
जिनके सानिध्य
का कल लाभ मिला
वो तो विरले
ही थे ।
अच्छे किसान
यहाँ कहाँ होते हैं ।
भूख, गरीबी, बिमारी
बाढ़, सूखा, पैंतरें सरकारी
अशिक्षा, ऋण, चोरी-चुहाड़ीआदि संयतियों
के बोझ से दबे
किसानों के पास
अच्छाई
रह कहाँ पाती है
ऊपर से कोसने को
इतने सारे मुर्गे -
प्रकृति, सरकार, गाँव का चमार
कामचोरी तो
सहसा ही आ जाती है।

ऐसे मे मीनू महतो
से भेंट एक सुखद
अनुभूति थी।
हिन्दी से स्नातक
मीनू को
सब पता है -
कविता के जन्म से लेकर
द्रव्यों के विज्ञान तक
सब्जियों से लेकर
बड़े-बड़े पेड़ उगाने के तरीके
बड़े अफ्सरान से
बात करने का लहजा
जनता की समझ
का अंदाज़
सब मीनू के व्यक्तित्व
में सहज आ जाता है ।
मीनू एक महान आविष्कारक हैं
दशवें में अर्जित ज्ञान को
भला कितने
एक कार्यशील जुगाड़
का जामा पहना पाते हैं ?
द्रव्य की सरलता
के मामूली एहसास को
लिफ्ट-सिंचाई के यन्त्र
में परिमूर्तित करना
भला कितने खेतिहरों
को चमका होगा ?
मीनू जी ने किया ।
आजकल मीनू
चक्कर काट रहे हैं कि
नक्सालियों से प्रभावित
जनजातियों के
घरों में
रौशनी हो
हरित उर्जा का विकास हो
दूर-दराज के
बदनसीबों को भी
नजदीकी का एहसास हो
उन्हें क्या
वह तो एक
सच्चे कर्मयोगी हैं
बस इतने में ही
मजा आ जाएगा ।
बहुत ना रहते हुए भी
अर्थ-विचार से परे
कर्म कि अवस्था में
आनंद की अनुभूति
खोजने वाले
लोचर गाँव के
किसान मुनि मीनू जी
तुम्हें शत-शत नमन ।

Sunday, December 16, 2007

एक प्यार

एक प्यार निराला
सबसे आला
बोला सर उठाए -
'हमसे बड़का केहू नाही
हम हूँ सबसे प्यारा ।
हम हूँ गुरु प्रति
सम्पूर्ण समर्पण
हम हूँ ज्ञान को
कृतज्ञ अर्पण
जनेंद्रियों से
ऊपर उठकर
ज्ञानेन्द्रिय का
उत्कार हम हूँ
हम में कछु
कलुषित नाही।
डुगडुगी बजा कर
ज्ञान गणित के
जब मास्साब ने
अन्धकार भगाया
प्रकाश के साथ
मानस मंदिर में
एक नटखट हलचल
भी आया ।
उत्पात मचाये
ध्यान बन्टाये
लाख समझाए
वह ना माने
वह था अंश हमारा .
जिस गणित से
डरती थी वह
आतुर थी अब
उसी को लेकर
लेकिन प्रकोप
हमरा ऐसा कि
मन में बसी थी
बस एक पिक्चर -
वह बकरी-दाढी वाला .
वह गणित का
ज्ञाता हीरो
जमता है क्या
सर मुंडवा के
और सर के सर पे
वह काला तिल
हमरी तेज में
दे बैठी दिल
वह कोमल चंचल बाला. '

सपनो में बेखबर
है वो हर दिन
ज़ल्द आएंगे
इम्तहान के दुर्दिन
तेज हैं अभी
गुरु-आसक्ति की लहरें
उन लहरों में
भोला दिल उबले
अध्ययन कक्ष में
शायरी बरसे
ज्ञान के कोने
ध्यान को तरसें
ऐसा है उसका हाल.

प्यार तो प्यार से
फेल करावायगा
डैडी का रौद्र
रूप दिखायेगा
बचपन के सपने को
आहत करेगा
ना मिलेगी शिक्षा
ना मिलेंगे पिया
जब तक डीन्गू
खुमारी उतरेगी
हो जायेगी
काफी लेट
एहसास होगा
तब जाकर जब
चढा दी जायेगी
किसी अन्य को भेंट .